शनिवार, 25 जून 2016

योगेश्वरी ( भाग -3) फिल्म

फिल्म योगेश्वरी भाग - 3 में प्रस्तुत है , श्री दुर्गा सप्तशती का पिछली फिल्म योगेश्वरी भाग - 2 का शेष , महाभारत के मैदान में श्री कृष्ण के आदेश पर अर्जुन द्वारा की गयी देवी योगेश्वरी की स्तुति , सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ श्री महाभारत में संपूर्ण विश्व के महाभारत सम्राट भारत जनमेजय सिंह तोमर ( सर्प सत्र या सर्प यज्ञ करने वाले ) को वैशम्पायन जी द्वारा सुनाया गया देवी ''योगेश्वरी ''  का स्तोत्र (वेदव्यास जी द्वारा रचित व पद्यबद्ध किया गया का स्तोत्र) प्रस्तुत है फिल्म येगेश्वरी भाग - 3 
Presented By Devputra Films and Media Pvt. Ltd. with collaboration of Gwalior Times and National Noble Youth Academy
https://youtu.be/WKUlYAIkOHU
देवपुत्र फिल्म्स एण्ड मीडिया प्रायवेट लिमिटेड , ग्वालियर टाइम्स एवं नंशनल नोबल यूथ अकादमी के साथ , सहयोग व सौजन्य से प्रस्तुत करती है फिल्म योगेश्वरी भाग - 3
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https://youtu.be/WKUlYAIkOHU

सोमवार, 7 सितंबर 2009

सूचना प्रौद्योगिकी- ई गवर्नेन्‍स- एनईजीपी - उम्दा प्रशासन लाने के प्रयास

सूचना प्रौद्योगिकी

 

ई गवर्नेन्‍स- एनईजीपी - उम्दा प्रशासन लाने के प्रयास

                                                     -- अभिषेक सिंह उप सचिव (ई-गवर्नेस) ; एनईजीपी जागरूकता एवं संचार के नोडल अधिकारी हैं

       पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्य सरकारों और केन्द्रीय मंत्रालयों ने ई-गवर्नेन्‍स के युग में प्रवेश के लिए अनेक कदम उठाए हैं। लोक सेवाओं की अदायगी को बेहतर और उनकी प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए अनेक स्तरों पर सतत प्रयास किये जा रहे हैं।

 

       राष्ट्रीय ई-गवर्नेन्‍स योजना (एनईजीपी) ई-गवर्नेन्‍स के संबंध में उठाए गए कदमों को देश भर के सामूहिक विजन (अन्तर्दृष्टि) में समेकित कर समग्र रूप से एक साझा लक्ष्य के रूप में देखती है। इसी विचार के  अनुरूप देश के सुदूर गांवों तक पहुंच रहे देशव्यापी बुनियादी ढांचे का विशाल नेटवर्क विकसित हो रहा है। अभिलेखों का बड़े पैमाने पर डिजिटलीकरण किया जा रहा है, ताकि इन्टरनेट पर आसानी से भरोसेमंद जानकारी मिल सके।

 

       मूल उद्देश्य उम्दा और सुस्पष्ट प्रशासनिक व्यवस्था को लोगों के दरवाजे तक पहुंचाना है। आखिरकार, भू-दस्तावेजों  की जानकारी प्राप्त करना, जन्म प्रमाण पत्र और पासपोर्ट हासिल करना, आयकर  विवरणी दाखिल करना और देश के सर्वोत्तम चिकित्सकों से परामर्श लेना माउस को क्लिक करने जैसा सरल ही होना चाहिए। और यह सब इतना निकट होना चाहिए कि जितना कि पड़ोस की दुकान।

 

राष्ट्रीय योजना की उत्पत्ति

       भारत में ई-गवर्नेन्‍स का परिदृश्य अब सरकारी विभागों के कम्प्यूटरीकरण से आगे बढक़र नागरिकों को केन्द्र में रखते हुए  सेवोन्मुखी और पारदर्शी हो चला है। राष्ट्रीय ई-गवर्नेन्‍स योजना का दृष्टिकोण, कार्यान्वयन पध्दति और प्रबंधन संरचना का अनुमोदन सरकार ने 2006 में किया था। पूर्व में उठाये गए विभिन्न कदमों की सफलताओं और विफलताओं  के अनुभवों ने देश की ई-गवर्नेन्‍स रणनीति को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

 

       इस धारणा का उचित संज्ञान लिया गया है कि यदि राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय सरकारों के स्तर पर ई-गवर्नेन्‍स में तेजी लानी है तो साझे विजन और रणनीति से निर्देशित कार्यक्रम का दृष्टिकोण अपनाना होगा।

 

       इस दृष्टिकोण को मुख्य और सहायक बुनियादी सुविधाओं के  आदान-प्रदान के जरिए खर्च में पर्याप्त बचत करने वाले उपाय के रूप में देखा गया है। निश्चित मानदंडों के आधार पर एक दूसरे के साथ मिलकर व्यवस्था को चलाया जा सकता है। इस दृष्टिकोण को नागरिकों के समक्ष सरकार का सही दृश्य पेश करने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है।

 

एनईजीपी यूनिवर्स

       एनईजीपी में केन्द्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के स्तर पर लागू की जाने वाली 27 मिशन रूपी और आठ सहायक घटकों वाली परियोजनाएं  शामिल हैं। सहायक घटकों का उद्देश्य उचित प्रशासनिक और संस्थागत व्यवस्था, मुख्य बुनियादी ढांचा, और ई-गवनर्ेंस अपनाने के लिए आवश्यक कानूनी ढांचे का गठन करना है। आठ सहायक घटक मिशन रूपी परियोजनाओं से परे हैं और उनकी जवाबदेही सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (डीआईटी) और प्रशासनिक सुधार और जन शिकायत निवारण विभाग (डीएआर एंड पीजी) पर है। डीआईटी के घटक हैं कोर इन्फ्रास्ट्रक्चर (एसडब्ल्यूएएन, एसडीसी और सीएससी), सपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी सहायता टेक्निकल असिसस्टेंस, प्रमुख नीतियां कोर पालिसीज और आर एंड डी  डीआईटी और डीएआर एंड पीजी के संयुक्त उत्तरदायित्व के क्षेत्र हैं-एचआरडीप्रशिक्षण, संगठनात्मक संरचना और जागरूकता तथा मूल्यांकन।

 

मिशन रूपी परियोजनाएं

 

                ,ubZthih ds vUrxZr 27 fe'ku ifj;kstuk,a vkrh gSaA buesa ukS dsUæh;] X;kjg jkT; vkSj lkr fofé ea=ky;ksa fokxksa esa QSyh ,dh—r ,e,eih fe'ku :ih ifj;kstuk,a lekfgr gSaA fe'ku eksM का तात्पर्य है कि परियोजनाओं का उद्देश्य और क्षेत्र स्पष्ट रूप से परिभाषित है, परिमेय निष्कर्ष (सेना स्तर) और सुपरिभाषित मुकाम तथा कार्यान्वयन की समय सीमा दी हुई है। उच्च नागरिक और व्यापार मिलन बिन्दु के आधार पर चिन्हित 27 मिशन रूपी परियोजनाएं इस प्रकार हैं --

केन्द्रीय मिशन रूपी परियोजनाएं

       एमसीए 21, पेंशन, आयकर, पासपोर्ट और वीसा आव्रजन, केन्द्रीय उत्पाद कर, बैंकिंग, एमएनआईसी  यूआईडी, ई-कार्यालय और बीमा।

 

राज्यों की मिशन रूपी परियोजनाएं

       भू-अभिलेख प्रथम चरण, भू-अभिलेख द्वितीय चरण एवं पंजीकरण, सड़क परिवहन, कृषि, पुलिस, कोषालय, नगरपालिकाएं, ई-जिला, वाणिज्यिक कर ग्राम पंचायत और रोजगार कार्यालय।

 

एकीकृत मिशन रूपी परियोजनाएं

       सीएससी, ई-न्यायालय, ईडीआई, इंडिया पोर्टल, एनएसडीजी, ई-बिज़, ई-प्रोक्योरमेंट (वसूली)।

 

सामान्य सेवा केन्द्र

       सरकार ने 6 लाख से अधिक गांवों में एक लाख से अधिक सामान्य सेवा केन्द्रों की स्थापना की मंजूरी दे दी है। सरकार ने जो योजना मंजूर की हैं, उसके अनुसार, सीएससी की भारतीय नागरिकों को केन्द्रीय, निजी और सामाजिक क्षेत्र की सेवाओं की एकीकृत अदायगी का प्रारंभिक बिन्दु के रूप में कल्पना की गई है। इसका उद्देश्य एक ऐसा मंच तैयार करना है जो सरकारी, निजी और सामाजिक क्षेत्र के संगठनों को उनके सामाजिक और व्यावसायिक लक्ष्यों विशेषकर देश के सुदूर गांवों की जनसंख्या के कल्याण से जुड़े विषयों को आईटी आधारित और अन्य सेवाओं के माध्यम से जोड़ सके।

 

       सीएससी, ई-गवर्नेन्‍स, शिक्षा, स्वास्थ्य, टेलीमेडिसिन, मनोरंजन आदि क्षेत्रों में उच्च स्तरीय और किफायती वीडियो, आवाज और आंकड़ों की जानकारी सेवायें प्रदान करने में सक्षम हैं। सीएससी की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह ग्रामीण क्षेत्रों में आवेदन पत्र को डाउनलोड करने, प्रमाण पत्र, बिजली, टेलीफोन, पानी और अन्य सेवाओं के बिलों के भुगतान जैसी वेब-योग्य ई-गवर्नेन्‍स से जुड़ी सेवायें प्रदान कर सकेगा।

 

स्वान (एसडब्ल्यूएएन) के साथ उड़ान भरना और एसडीसी'ज के जरिये सेवा प्रदान करना

       राज्य व्यापी एरिया नेटवर्क (एसडब्ल्यूएएन) योजना एनईजीपी की तीन प्रमुख अधोसंरचनात्मक स्तंभों में से एक है। मार्च 2005 में भारत सरकार द्वारा अनुमोदित इस योजना के लिए अनुमानत: 33 अरब 34 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य प्रत्येक राज्य केन्द्र शासित प्रदेश के मुख्यालय को जिला मुख्यालय से और जिला मुख्यालय को (2 मेगाबाइट्स प्रति सेकेंड) ब्लाक मुख्यालयों से आपस में जोड़ते हुए राज्य व्यापी एरिया नेटवर्क (स्वान-एसडब्ल्यूएएन) स्थापित करना है। यह सुविधा न्यूनतम 2एमवीपीएस (मेगा बाइट्स प्रति सेकेंड) की लीज्ड लाइन पर दी जाएगी। योजना का उद्देश्य जी 2जी और जी2सी सेवायें प्रदान करने के आशय से एक सुरक्षित घनिष्ठ उपयोगकर्ता समूह (सीयूजी) सरकारी नेटवर्क स्थापित करना है।

 

       परियोजना की अवधि 5 वर्ष है जबकि पूर्व परियोजना क्रियान्वयन अवधि  18 महीने की है। एक केन्द्रीय योजना के रूप में अमल में लायी जा रही इस परियोजना के लिए 20 अरब 5 करोड़ रुपए सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने अनुदान के रूप में दिये हैं। शेष राशि अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता (एसीए) के रूप में मिलने वाली राज्य योजना के तहत प्राप्त होगी।

 

       राज्य आंकड़ा केन्द्र (स्टेट डाटा सेन्टर-एसडीसी)- एनईजीपी के तहत एक और प्रमुख संरचनात्मक स्तंभ है। जी-2जी, जी2सी और जी2बी सेवाओं की उम्दा इलेक्ट्रॉनिक अदायगी के लिए सेवा व्यवस्था  उसके इस्तेमाल और बुनियादी ढांचे को सुगठित बनाने के लिए राज्यों में एसडीसीज स्थापित करने का प्रस्ताव है। राज्यों द्वारा ये सेवायें राज्य व्यापी एरिया नेटवर्क (स्वान) और सामान्य सेवा केन्द्र (सीएससी) की ग्रामीण स्तर  तक की कनेक्टीविटी  (संचार संपर्क) जैसी बुनियादी संचार सुविधाओं के सहयोग से दोषरहित ढंग से मुहैया करायी जा सकती हैं।

 

       राज्य आंकड़ा केन्द्र (एसडीसीज) राज्य के केन्द्रीय भंडार, सुरक्षित आंकड़ा कोष, ऑन लाइन सेवा अदायगी, नागरिक सूचना  सेवा पोर्टल, राज्य इन्टरनेट पोर्टल, आपदा की भरपाई, सुदूर प्रबंधन और सेवा एकीकरण का कार्य  करते हुए  अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। एसडीसी'ज की सहायता से आंकड़ा प्रबंधन, आईटी संसाधन प्रबंधन, तैनाती और अन्य खर्चों में अधिक से अधिक कमी लाई जा सकती है।

 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान - vडॉ. सौरभ दीक्षित

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान

v                डॉ. सौरभ दीक्षित

v                 लेखक भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान में फेकल्टी मेम्बर है

 

       पर्यटन में केरियर बनाने वाले छात्रों का प्रथम प्रयास भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान में प्रवेश के लिये होता है। यह संस्थान विगत 26 वर्षों से देश में पर्यटन, शिक्षा एवं मानव संसाधन के लिये सेवारत है। यहां स्नातकोत्तर स्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार(इंटरनेशन बिजनेस), सेवा क्षेत्र (सर्विसेज सेक्टर), पर्यटन एवं यात्रा (टूरिज्म एवं ट्रेवल) और पर्यटन एवं लेजर (टूरिज्म एवं लेजर) विषयों में प्रबंधन की उपाधि दी जाती है । इसके अलावा कई विषयों जैसे कि कम्प्युटराइज्ड आरक्षण प्रणाली, फ्रेंच एवं जर्मन विदेशी भाषायें, पर्यटन प्रबंधन, ईको टूरिज्म, ग्राहक संतुष्टि आदि विषयों पर शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग पाठयक्रम आवश्यकतानुसार चलाये जाते हैं ।  संस्थान का प्लेसमेंट रिकार्ड बहुत अच्छा है। विश्व में आर्थिक मंदी के बावजूद इस वर्ष संस्थान के पर्यटन छात्रों का प्लेसमेंट शत-प्रतिशत रहा। नौकरी देने वाली कम्पनियों में थॉमस कुक, एसओपीसी, ओरबिट, सर्दन ट्रेवल्स, लिस्परिंग पॉम आदि कम्पनियां हैं । संस्थान के सभी पाठयक्रम एआईसीटीई द्वारा मान्यता प्राप्त हैं । संस्थान में आने वाले गणमान्य प्रोफेसर्स/ व्यवसायियों में प्रोफेसर एरिक कोहेम(इजरायल), प्रोफेसर क्रिस कूपर , श्री प्रेम सुब्रमण्यम , श्री इंदर शर्मा, प्रोफेसर तपन पंडा, आईआईएम इन्दौर आदि प्रमुख हैं ।

इन्फ्रास्ट्रक्चर - संस्थान 22 एकड़ के हरेभरे सुरम्य वातावरण में फैला हुआ है जो यहां आने वाले छात्रों को अनायास ही अपनी ओर खींच लेता है । खेलकूद में रूचि रखने वाले छात्रों के लिये बिलियर्डस, स्नूकर, बेडमिंटन, क्रिकेट, जिमनेज्यिम, बॉलीबाल, केरम,शतरंज, फुटबाल आदि की सुविधायें हैं । संस्थान का सभागार एयरकंडीशन है एवं इसमें 500 लोग बैठ सकते  हैं । संस्थान में दो संगणक केन्द्र जिनमें करीब 90 कम्प्यूटर्स लगे हुये हैं । ये संगणक केन्द्र पर्यटन एवं प्रबंधन से संबंधित सॉफ्टवेयर द्वारा युक्त हैं । सभी कम्प्यूटर्स में छात्रों, कर्मचारियों के लिये इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध है। संस्थान का पुस्तकालय पर्यटन के क्षेत्र में देश का सबसे बड़ा पर्यटन से संबंधित पुस्तकों का संग्रह केन्द्र है।

आईआईटीटीएम की स्थापना सन् 1983 में संसदीय समिति की अनुशंसा पर भारत सरकार ने की थी । पिछले कई वर्षों से पर्यटन के क्षेत्र में मानव संसाधन की कमी महसूस की जा रही थी । अत: आईआईटीटीएम की स्थापना पर्यटन के क्षेत्र में एक अपेक्स बॉडी की तरह दिल्ली में की गई । सन् 1992 में इसको ग्वालियर स्थानांतरित किया गया । इसके पश्चात सन् 1996 में संस्थान में पर्यटन, यात्रा विषय पर

स्नातकोत्तर डिप्लोमा शुरू किया गया । जो कि भारतवर्ष में काफी प्रचलित हुआ। तत्पश्चात पर्यटन एवं प्रबंधन से संबंधित विषयों में स्नातकोत्तर डिग्री एवं पर्यटन में स्नातक डिग्री शुरू की गई । वर्तमान में संस्थान पीजीडीएम की उपाधि देता है । संस्थान एशिया पेसिफिक क्षेत्र में उन गिने चुने संस्थानों / विश्वविद्यालयों में से एक है जो पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि देते हैं ।

संस्थान नियमित पाठयक्रमों के अलावा अपने एवं पर्यटन मंत्रालय के लिये केपीसिटी बिल्ंडिग एवं टूरिज्म (सीबीएसटी), लर्न वाइल यू अर्न (एलडब्ल्यूवायएन), डोनर, विदेशी छात्रों के लिये मार्कोपोलो , गाइड ट्रेनिंग कोर्स संचालित करता है । एक साथ 450 से अधिक गाइडों को एक ही स्थान पर ट्रेनिंग देने के लिये संस्थान का नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है । आने वाले समय में संस्था पीएचडी स्तर के शोध कार्य करायेगा ।

       संस्थान कई राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संस्थाओं जैसे कि यूएनएसके द्वारा गठित एशिया पेसिफिक एज्यूकेशन एंड ट्रेनिंग इन्स्टीटयूशन इन टूरिज्म (एपीइटीआईटी), एमडिशा, इंडियन एसोसियेशन ऑफ टूर आपरेटर्स , ट्रेवल एजेन्ट्स एसोसियेशन आफ इंडिया , एफएचआरएआई का सदस्य है । संस्थान एशिया पेसिफिक एज्यूकेशन एंड ट्रेनिंग इन्स्टीटयूशन इन टूरिज्म (एपीइटीआईटी), इन्टरनेशनल फोकल पॉइंट है तथा संस्थान के निदेशक प्रोफेसर सितीकंठ मिश्रा इसके वाइस चेयरमेन हैं । संस्थान ऐपिटिक का आधिकारिक न्यूज लेटर भी प्रकाशित करता है जिसका प्रचार-प्रसार 37 देशों में है ।

      भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान एक मल्टी केम्पस इन्स्टीटयूट है । इसके केन्द्र नई दिल्ली, भुवनेश्वर एवं गोवा में है । ग्वालियर सेंटर हेडक्वार्टर है । गोवा केन्द्र को नेशनल इन्स्टीटयूट आफ वाटर स्पोट्र्स के नाम से जाना जाता है । जोकि वाटर स्पोट्र्स में शर्ट टर्म कोर्सेस चलाता है और कई राज्यों को कन्सलटेंसी देता है ।

आगामी वर्षों में संस्थान का विस्तार प्रस्तावित है । संस्थान भारत सरकार को कॉमनवेल्थ गेम्स में कमरों की आवश्यकता, और एसिसिबल टूरिज्म पर रिसर्च में भी सहायता दे रहा है ।

 

बुधवार, 5 अगस्त 2009

राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय ग्वालियर

राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय ग्वालियर

·                    डॉ. डी.एस.चंदेल

·                    रजिस्ट्रार,राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय

 

 

      राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की स्थापना 19 अगस्त 2008 को राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय अध्यादेश 2008 के अन्तर्गत हुई थी । इस विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु कई वर्षों से प्रयास किये जा रहे थे । इसी संदर्भ में माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान , माननीय श्री अनूप मिश्रा मंत्री म.प्र. शासन, माननीय श्री नरेन्द्र सिंह जी तोमर प्रदेश अध्यक्ष एवं अन्य स्थानीय सांसदों गणमान्य अतिथियों की उपस्थित में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई ।

       राजा मानसिंह तोमर की साहित्य एवं संगीत के प्रति अगाध श्रध्दा थी । उनके कार्यकाल में ग्वालियर में संगीत विद्यालय की स्थापना की गई , जो शायद भारत वर्ष का पहला संगीत विद्यालय था। राजा स्वयं भी संगीतज्ञ एवं कवि थे व संगीत की ध्रुपद शैली के प्रणेता भी ।  राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय अधिनियम 2009 विधानसभा द्वारा 11 फरवरी 2009 को पारित हुआ । इस अधिनियम के अन्तर्गत विश्वविद्यालय के संचालन के लिये प्रथम कुलपति, आचार्य पं. चित्तरंजन ज्योतिषी को विश्वविद्यालय स्थापना के लिये शीघ्र समस्त कार्य पूर्ण करने के निर्देश दिये गये हैं । इस अधिनियम के अन्तर्गत बीस सदस्यों वाली एक साधारण परिषद् होगी , जिसके अध्यक्ष माननीय मुख्यमंत्री जी होंगे ।  विश्वविद्यालय की एक कार्य परिषद और विद्या परिषद भी होगी  जो कि विश्वविद्यालय का संचालन करेगी । इस विश्वविद्यालय का क्षेत्र संपूर्ण मध्यप्रदेश होगा।

       वर्तमान में विश्वविद्यालय के अन्तर्गत 24 महाविद्यालय संबध्दता प्राप्त हैं और इसके लिये जो पाठयक्रम हैं उनको निर्धारित करने के लिये विभिन्न विद्वानों की बैठकें संपन्न हो चुकी हैं । इस अधिनियम के अन्तर्गत संगीत संकाय, नृत्य संकाय, कला संकाय और अन्य संकाय जो परिनियम के अधीन होंगे का गठन किया गया है । यह भी निर्णय लिया गया कि नाटय संकाय को भी इसमें शामिल किया गया ।

      भोपाल में संस्कृति मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा, श्री मनोज श्रीवास्तव, प्रमुख सचिव संस्कृति विभाग,       श्री राम तिवारी संचालक संस्कृति विभाग, पं चित्तरंजन ज्येतिषी कुलपति जी की उपस्थिति में विश्विद्यालय के समग्र विकास पर चर्चा हुई । शैक्षणिक पदों का सृजन अन्य सुविधाओं पर विशेष रूप से चर्चा हुई और एक संबध्द कार्यकम के अन्तर्गत इसको पूर्ण करने का निर्णय लिया गया । इस विश्वविद्यालय में सभी संकायों में शोधकार्य, स्नातकोत्तर पाठयक्रम, स्नातक स्तर के पाठयक्रम , पोस्ट ग्रेज्युएट डिप्लोमा एवं शार्ट कोर्स भी होंगे।

विश्वविद्यालय का उद्देश्य -

1-     संगीत एवं कला संबंधी विद्या तथा ज्ञान का अभिवर्धन तथा उसका प्रसार और भारतीय समाज के विकास में रचनात्मक भूमिका सुनिश्चित करना ।

2-     छात्रों तथा अनुसंधनकर्ता विद्वानों में संगीत एवं कला के क्षेत्र में सुधारों के संबंध में बुध्दि-कौशल का विकास करके संगीत एवं कला तथा संबंधित क्षेत्र में समाज की सेवा करने के उत्तरदायित्व की भावना का विकास करना ।

3-     संगीत से संबंधित ज्ञान की अभिवृध्दि के लिये अभिभाषणों, सेमीनारों, परिसंवादों और अधिवेशनों को आयोजित करन  और संगीत एवं कला संबंधी प्रक्रिया को सामाजिक विकास का प्रभावशाली उपकरण बनाना ।

4-     परीक्षायें आयोजित करना और उपाधियां तथा अन्य विद्या संबंधी विशिष्टताएं प्रदान करना ।

5-     ऐसे समस्त कार्य करना जो विश्वविद्यालय के समस्त उद्देश्यों या उनके से किसी भी उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये आनुषंगिक, आवश्यक या सहायक हैं ।

6-     विश्वविद्यालय का और गवेषणा, शिक्षा और शिक्षण के ऐसे केन्द्रों क, जो विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को अग्रसर करने हेतु आवश्यक है, प्रशासन तथा प्रबंधन करना ।

7-     संगीत एवं कला संबंधी ज्ञान या विद्या की ऐसी शाखाओं में, जैसा कि विश्वविद्यालय उचित समझे, शिक्षण हेतु उपबंध करना और गणवेषण के लिये संगीत एवं कला के ज्ञान की अभिवृध्दि तथा प्रसार के लिये उपबंध करना ।

8-                              अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, पुरस्कार तथा पदक संस्थित करना तथा प्रदान करना ।